किस देश से आया था दिल्ली पर राज करने वाला जलालुद्दीन फिरोजशाह? दुश्मनों को माफ किया, यही सबसे बड़ी गलती की

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश का संस्थापक था. उसने 736 साल पहले आज के ही दिन यानी 13 जून 1290 को दिल्ली की सत्ता संभालकर इतिहास में एक नया अध्याय लिखा था. वह खिलजी वंश का संस्थापक था. इतिहास में उसे एक उदारमना शासक के रूप में दर्ज किया गया है. कई जगह दर्ज है कि उसने अपने दुश्मनों को भी माफ किया. इसी का फायदा उठाकर उसके भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने उसका कत्ल करवाकर खुद सिंहासन पर बैठ गया.

आइए जानते हैं कि आखिर कौन था दिल्ली पर राज करने वाला जलालुद्दीन फिरोजशाह? किस देश से आया था परिवार, जिसने 13 जून से सत्ता की शुरुआत करके रचा इतिहास.

दिल्ली का एक उदार सुल्तान

इतिहास के पन्नों में जलालुद्दीन फिरोज खिलजी को दिल्ली सल्तनत के सबसे उदार और वृद्ध सुल्तानों में से एक माना जाता है. उसने गुलाम वंश के अंतिम शासक का अंत करके खिलजी क्रांति की शुरुआत की. उसने करीब 70 वर्ष की आयु में दिल्ली का सिंहासन हासिल किया.

कहां से आया खिलजी परिवार?

जलालुद्दीन का परिवार मूल रूप से तुर्क था. हालांकि, यह परिवार लंबे समय तक अफगानिस्तान के हेलमंद नदी के किनारे स्थित खल्ज नामक क्षेत्र में रहा. इसी क्षेत्र के नाम पर इन्हें खिलजी कहा गया. भारत आने से पहले इन्होंने अफगानी तौर-तरीके अपना लिए थे. इस वजह से दिल्ली के तुर्क अमीर इन्हें शुरू में तुर्क नहीं मानते थे और इनका विरोध करते थे.

ऐतिहासिक दिन जब वह सिंहासन पर बैठा

इतिहासकारों के अनुसार, 13 जून 1290 को जलालुद्दीन फिरोज खिलजी का राज्याभिषेक हुआ. उसने दिल्ली के पास किलोखरी के महल में अपनी सत्ता की घोषणा की. यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश के प्रभुत्व को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया. जलालुद्दीन का शासनकाल केवल छह साल तक रहा, लेकिन उसने शासन की एक नई शैली विकसित की.

तलवार के बजाय उदारता की नीति

जलालुद्दीन ने उस दौर में हिंसा के बजाय उदारता को प्राथमिकता दी. वह कहता था कि वह एक वृद्ध मुसलमान है और मुसलमानों का रक्त बहाना उसकी फितरत नहीं है. उसने बलबन के समय के कठोर नियमों को शिथिल कर दिया. विद्रोहियों के प्रति भी उसने नरम रुख अपनाया, जो उस समय के इतिहास में एक दुर्लभ बात थी.

किलोखरी को बनाया अपनी राजधानी

जलालुद्दीन अपनी सुरक्षा और तुर्क अमीरों के विरोध के कारण शुरू में पुरानी दिल्ली नहीं गया. उसने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया और उसे सुंदर ढंग से सजाया. उसने वहीं से प्रशासन चलाना शुरू किया. लगभग एक साल बाद जब दिल्ली की जनता और अमीरों का गुस्सा शांत हुआ, तब उसने दिल्ली के मुख्य शहर में प्रवेश किया.

आज किस हाल में है किलोखरी एरिया?

इतिहास की किताबों में किलोखरी को उस समय के नए शहर या कुश्क-ए-लाल के पास का क्षेत्र माना जाता था. आज के समय में किलोखरी दक्षिण दिल्ली का एक प्रमुख इलाका है. यह प्रसिद्ध महारानी बाग और आश्रम चौक के बिल्कुल पास स्थित है. उस समय यमुना नदी किलोखरी के पास से बहती थी, जो सुरक्षा और सुंदरता दोनों लिहाज से बेहतर थी. इस किले का निर्माण गुलाम वंश के सुल्तान कैकूबाद ने शुरू करवाया था, लेकिन जलालुद्दीन ने इसे पूरा कराकर अपना राज्याभिषेक यहीं करवाया. जलालुद्दीन ने यहां एक भव्य महल और बगीचे बनवाए. आज किलोखरी एक घनी आबादी वाला गांव और शहरी इलाका है, जहां पुरानी ऐतिहासिक निशानियां लगभग खत्म हो चुकी हैं, लेकिन दिल्ली के इतिहास के पन्नों में इसका नाम जलालुद्दीन की सत्ता की शुरुआत की जगह के रूप में दर्ज है.

किन लोगों को कहा गया नवीन मुसलमान?

जलालुद्दीन के समय में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया. साल 1292 में अब्दुल्ला के नेतृत्व में मंगोल सेना आई. जलालुद्दीन ने उन्हें परास्त किया. बाद में एक समझौता हुआ, जिसके तहत हजारों मंगोलों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया. वे दिल्ली के पास बस गए और उन्हें नवीन मुसलमान कहा गया. जिस जगह वे बसे उसे आज भी मंगोलपुरी के नाम से जाना जाता है.

क्या थीं जलालुद्दीन शासन की चुनौतियां?

जलालुद्दीन का शासन चुनौतियों से भरा था. कड़ा-मानिकपुर के सूबेदार मलिक छज्जू ने उसके खिलाफ विद्रोह किया. हालांकि, जलालुद्दीन ने उसे हरा दिया, लेकिन उसे दंड देने के बजाय माफ कर दिया. उसकी इसी अत्यधिक उदारता का उसके भतीजे और दामाद अलाउद्दीन खिलजी ने फायदा उठाया.

देवगिरि का अभियान और अलाउद्दीन की महत्वाकांक्षा

जलालुद्दीन के समय में ही अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत के देवगिरि पर सफल आक्रमण किया. वहां से उसे अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई. इस सफलता ने अलाउद्दीन के मन में सुल्तान बनने की इच्छा पैदा कर दी. उसने जलालुद्दीन को इलाहाबाद के पास कड़ा में बुलाने का षड्यंत्र रचा. जुलाई 1296 में जब वृद्ध जलालुद्दीन अपने भतीजे अलाउद्दीन से मिलने कड़ा गया, तो वहां उसकी हत्या कर दी गई. अलाउद्दीन ने धोखे से अपने चाचा और ससुर का सिर कलम करवा दिया और खुद को सुल्तान घोषित कर दिया. इस तरह एक उदार शासक का अंत अत्यंत दुखद रहा.

आज कड़ा वास्तव में कहां है?

कड़ा, उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के सिराथू तहसील में गंगा नदी के तट पर स्थित है. यह प्रयागराज शहर से लगभग 65 से 70 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में स्थित है. इतिहास में कड़ा और मानिकपुर दोनों का नाम एक साथ लिया जाता है. कड़ा गंगा नदी के एक किनारे कौशाम्बी की तरफ है. मानिकपुर नदी के ठीक दूसरी ओर प्रतापगढ़ जिले में है. मध्यकाल में यह एक बहुत बड़ा प्रशासनिक केंद्र हुआ करता था. यही वह स्थान है जहां 1296 में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन फिरोज शाह खिलजी को धोखे से बुलाया. जब जलालुद्दीन नदी पार कर अलाउद्दीन से गले मिलने पहुंचा, तो वहीं गंगा के किनारे उसकी हत्या कर दी गई.

जलालुद्दीन का ऐतिहासिक महत्व

जलालुद्दीन ने यह सिद्ध किया कि केवल धर्म और जाति के आधार पर शासन नहीं किया जा सकता. उसने भारतीय जनता की इच्छाओं का सम्मान करने की कोशिश की. उसने शासन में गैर-तुर्क और भारतीय मुसलमानों को भी स्थान दिया. खिलजी क्रांति ने दिल्ली सल्तनत के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया, जिसका लाभ बाद में अलाउद्दीन खिलजी को मिला.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!