इंटरनेशनल डेस्क: G-7 देशों के साथ मीटिंग के बाद अमेरिका की तैयारी जी-2 समिट की है. पेरिस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसकी घोषणा की. ट्रंप ने कहा कि अब जी-2 की मीटिंग होगी, इसके बाद हम जी-20 देशों के साथ बैठक करेंगे. ट्रंप ने इस दौरान पत्रकारों से पूछा कि आपको जी-2 के बारे में पता है?
ट्रंप ने यह सवाल इसलिए पूछा था, क्योंकि आधिकारिक तौर पर जी-2 समूह का कोई अस्तित्व नहीं है. कूटनीतिक की दुनिया में अमेरिका और चीन के बीच की बैठक को जी-2 देशों की बैठक कहा जाता है. 2005 में मशहूर अमेरिकी अर्थशास्त्री सी. फ्रेड बर्गस्टेन ने इसकी अवधारणा दी थी.
बर्गस्टेन का कहना था कि अमेरिका और चीन अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया के 2 सबसे अहम देश हैं. दोनों को साथ में तरक्की करने के लिए एक समूह में काम करने की जरूरत है.
2025 में हुई थी आखिरी बैठक
जी-2 की बैठक आखिरी बार दक्षिण कोरिया में हुई थी. हालांकि, उस वक्त बैठक को लेकर सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिक्रिया दी थी. चीन ने जी-2 बैठक पर कुछ नहीं कहा था. इस साल मई महीने के मध्य में डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग गए थे, लेकिन इस मीटिंग का नाम जी-2 नहीं दिया गया.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर 2026 में बीजिंग जाने वाले हैं. माना जा रहा है कि अमेरिका इस बैठक को जी-2 नाम दे सकता है.
दिलचस्प बात है कि इस समूह का न तो कोई दफ्तर है और न ही समूह के बारे में किसी आधिकारिक दस्तावेज में कुछ जिक्र है.
यह भारत के लिए झटका क्यों है?
दक्षिण एशिया में चीन की तरह भारत भी एक प्रमुख और मजबूत देश है. चीन और भारत को प्रतिद्वंद्वी देश भी माना जाता है. अब तक चीन और अमेरिका के रिश्ते ठीक नहीं रहे हैं, जिसका फायदा भारत को मिलता रहा है. दक्षिण एशिया में चीन को शांत करने के लिए अमेरिका और भारत ने मिलकर क्वाड का गठन किया था. पिछले महीने ही नई दिल्ली में क्वाड की मीटिग हुई थी.
ऐसे में अब अगर चीन के साथ अमेरिका जी-2 की मीटिंग करता है तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा. बाइडेन जब राष्ट्रपति थे, तब पूरे कार्यकाल में सिर्फ एक बार उन्होंने जिनपिंग से मुलाकात की. ट्रंप इस साल दूसरी बार जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं.
वहीं ताइवान एशिया एक्सचेंज फाउंडेशन की फेलॉ सना हाशमी का मानना है कि चीन जी-2 की अवधारणा को ज्यादा महत्व नहीं देता. उनके अनुसार, चीन ऐसी विश्व व्यवस्था का समर्थक नहीं है, जिसमें उसे अमेरिका के साथ वैश्विक नेतृत्व साझा करना पड़े. यही कारण है कि वह अमेरिका के साथ होने वाली किसी भी बैठक को “जी-2 बैठक” के रूप में पेश नहीं करता.