यहां था वीर आल्‍हा-ऊदल का महल, इसके सामने आज भी घोड़े पर सवार होकर नहीं निकल सकते

महोबाः उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड की वीरभूमि महोबा (Mahoba News) में एक ऐसा अद्भुत स्थान है जहां से घोड़े में सवार होकर निकलने पर मनाही है। इस स्थान के पास आते ही घोड़े के पांव रुक जाते हैं। घोड़े से उतरकर घुड़सवार नमन करने के बाद ही आगे निकलता है। मान्यता भी है कि घोड़े से यदि कोई नहीं उतरा तो उसे आगे चलकर दंड भी मिल जाता है। यह स्थान सैकड़ों साल पुराना है जिसके अतीत में तमाम रहस्य छिपे हैं।

महोबा से पांच किमी दूर दिसरापुर गांव का इतिहास सदियों साल पुराना है। यहां खेतों में अब भी वीर आल्हा, ऊदल से जुड़ी यादों को समेटे भवनों के अवशेष मिलते हैं। दलसू मामू का स्थान है जहां आज भी लोग घोड़े पर सवारी कर नहीं निकल सकते हैं। चंदेल वंश के अंतिम शासक परमार्दिदेव का शासन 1202 तक रहा। उनके शासन काल में चंदेल सेना ने दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान को हराकर जीत का डंका बजाया।

इस युद्ध में चंदेल शासक के वीर योद्धा आल्हा, ऊदल की वीरता से चौहान सेना के दांत खट्टे हो गए। इतिहास आल्हा, ऊदल की वीरता के किस्सों से भरा है। ऊदल का जन्म पिता के निधन के बाद हुआ। माता देवल ऊदल का त्याग करना चाहती थीं मगर रानी मलहना ने ऊदल की परवरिश की। रानी मलहना ने भी ब्रहाजीत, इंद्रजीत और रणजीत को जन्म दिया। बाद में वीर आल्हा, ऊदल ने पराक्रम का परिचय देते हुए पिता की मौत का बदला लिया और 52 लड़ाईयों में जीत हासिल की।

आल्हा-ऊदल की वीरता के सामने कोई नहीं टिका

इतिहासकारों के अनुसार, चंदेल राजा परमार की शक्तिशाली राजाओं में गिनती होती थी। उन्‍होंने 1167 में उरई के परिहार राजा को पराजित कर राजकुमारी मलहना से विवाह किया और उनकी दो बड़ी बहन देवल और तिलका का विवाह अपने सेनापति दक्षराज व बच्छराज से करवा दिया। इन बहनों का एक भाई था जिसका नाम माहिल था। सेनापति दक्षराज और बच्छराज के दो-दो पुत्र हुए जिनके नाम आल्हा, ऊदल और मलखान, सुलखान रखे गए। आल्हा, ऊदल अपने पिता की तरह वीर योद्धा रहे। परमार राजा ने सीमा विस्तार की तो मांडू तक सीमा पहुंच गई जिसके बाद मांडू के नरेश राय करिंगा की सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें करिंगा ने छल करते हुए रात्रि में सोते समय महोबा सेना पर हमला बोल दिया और दक्षराज और बच्छराज को गिरफ्तार कर भयंकर सजा देते हुए कोल्हू में पिसवा दिया।

गांव में नहीं चलता कोल्हू, शराब और मांस वर्जित

वीर आल्हा-ऊदल के गांव दिसरापुर में लोग आज भी उनकी वीरता के गीत गाते हैं। गांव के छेदालाल राजपूत बताते हैं कि गांव में वीर आल्हा और ऊदल का जन्म हुआ। दिसरापुर दस मजरा से मिलकर बना है। ढालापुर, हटाई, कटंवा, भुरी, बगाहां हरदस आदि मजरा को मिलकर दसपुरवा बने, जिन्हें बाद में दिसरापुर कहा गया। उनका कहना है कि गांव में स्थित पहाड़ में वीर आल्हा-ऊदल का घर था जो खंडहर में तब्दील हो गया था। बाद में इसके अवशेषों को नहर आदि के निर्माण में लगा दिया गया। यहां दलसू मामू का स्थान है जहां आज भी लोग घोड़े पर सवारी कर नहीं निकल सकते है। गांव में मांस-मदिरा का सेवन और कोल्हू का प्रयोग वर्जित है। वीर आल्हा, ऊदल के पिता को कोल्हू में पीसने के कारण यहां कोल्हू नहीं चल सकता। जिसने भी मांस-मंदिरा का सेवन करने का प्रयास किया उसे बाद में प्राश्चित करना पड़ा।

रहस्यों से भरा है आल्हा-ऊदल का जन्म स्थान

दिसरापुर गांव में स्थित पहाड़ पर आल्हा ऊदल का घर होने की जानकारी पीढ़ी-दर पीढ़ी चली आ रही है। इस पहाड़ को लोग चने का पहाड़ भी कहते हैं, जबकि कोई यहां सांपों का डेरा होने की जानकारी देते हैं। कहते हैं कि आज भी समय-समय पर आल्हा, ऊदल को लेकर कोई न कोई हलचल मिल जाती है। जब भी लोगों पर संकट आता है तो लोग आल्हा गायन के जरिए वीरों का नमन करते हैं। वीरता की याद में महोबा में कजली महोत्सव मनाया जाता है। कीरत सागर तटबंध में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान और परमार सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। रक्षाबंधन के एक दिन बाद दिल्ली नरेश को युद्ध में मात खानी पड़ी। इसके बाद विजय दिवस मनाया गया जो आज भी मनाया जाता है। सप्ताह तक चलने वाले कजली महोत्सव में शोभा यात्रा में वीर आल्हा ऊदल की झाकियां निकाली जाती है।

आल्हा-ऊदल ने चौहान सेना के किए थे दांत खट्टे

इतिहासकार डॉ एलसी अनुरागी का कहना है कि मामा माहिल ने राजा परमार के कान भरकर वीर आल्हा-ऊदल को राज्य से निकलवा दिया। दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान को आल्हा-ऊदल के न होने की खबर देकर आक्रमण करने को कहा। माहिल परमार से उरई में किए गए हमला का बदला लेना चाहता था। आल्हा, ऊदल कन्नौज पहुंचे जहां राजा जयचंद्र ने उन्हें शरण दी। बाद में दिल्ली नरेश के आक्रमण की सूचना पर वीर आल्हा, ऊदल साधू के वेश में आए और दिल्ली नरेश को युद्ध में पराजित कर दिया। वीरता की याद में महोबा में कजली महोत्सव मनाया जाता है। कीरत सागर तटबंध में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान और परमार सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। रक्षाबंधन के एक दिन बाद दिल्ली नरेश को युद्ध में मात खानी पड़ी जिसके बाद वीर भूमि में विजय दिवस मनाया गया।

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