एक हाथ में तलवार दूसरे में कुल्हाड़ी… तैमूर ने कैसे सुल्तान और मल्लू खां को हराकर दिल्ली पर कब्जा किया

 

दिल्ली अभी नहीं, बल्कि इतिहास में भी ताकत का केंद्र रहा है. इसके खजाने की कहानियां सुनकर कई शासक सोने की चिड़िया कहे जाने वाले हिंदुस्तान में हमला करने आते थे. ऐसे ही 1398 में समरकंद का शासक दिल्ली लूटने आया. यह और कोई नहीं बल्कि तैमूर लंग था. वो इंसान जिसकी गिनती इतिहास के क्रूरतम शासकों में होती है.

तैमूर में राज्यों को जीतने का जुनून था. इतिहासकार लिखते हैं कि जब उसने दिल्ली पर हमला किया तो यहां ऐसा नरसंहार दिखा कि सड़कों पर लाशों के ढेर लग गए. आइए जानते हैं उस ऐतिहासिक घटना के बारे में जिससे 100 सालों तक दिल्ली उबर नहीं पाया.

दिल्ली तक पहुंचना ही बड़ी चुनौती?

तैमूर लंग 1369 में समरकंद का राजा बना था. उसका सपना पूरी दुनिया जीतना था. 1398 में उसने दिल्ली पर हमला करने के लिए कूच किया. दिल्ली में लड़ाई से पहले तैमूर की सेना के सामने वहां तक पहुंचने का रास्ता ही बड़ी चुनौती था. दरअसल, दिल्ली समरकंद से करीब 1,000 मील दूर था. ऊपर से दिल्ली तक के सफर में सेना को बर्फीले चट्टानों, गर्मी से झुलसा देने वाले रेगिस्तान और बंजर जमीन से होते हुए जाना था. तैमूर की 90,000 सैनिकों की सेना को उनके दोगुनी संख्या में घोड़ों के साथ यह मंजिल तय करनी थी.

तैमूर ने दिल्ली पहुंचने के रास्ते में आने वाले राज्यों को लूटा और कत्ल-ए-आम मचाया. दिसंबर के महीने में तैमूर दिल्ली लंग शहर पहुंचा. उसके लिए दिल्ली पर हमला करने का यह सबसे उचित समय था. दरअसल, आपसी लड़ाई के कारण दिल्ली की ताकत बहुत घट चुकी थी. फ़िरोज़ शाह तुग़लक की मौत के बाद पूरा भारत बंगाल, कश्मीर और दक्कन जैसे इलाकों में बंट चुका था. जस्टिन मरोज़ी अपनी किताब ‘टैमरलेन’ में लिखते हैं, ‘उस समय दिल्ली पर सुल्तान मोहम्मद शाह राज कर रहे थे लेकिन वास्तविक प्रशासन मल्लू ख़ां के नियंत्रण में था’.

तैमूर को दिल्ली सेना में सबसे ज्यादा डर वहां की फौज का नहीं बल्कि हाथी का था. उसने अपनी आत्मकथा ‘मुलफ़िज़त तिमूरी’ में लिखा, ‘मेरी सबसे बड़ी चिंता थी ताकतवर भारतीय हाथी. हमने समरकंद में उनके बारे में कहानियां सुन रखी थीं और पहली झड़प में हमने उनके कारनामे भी देख लिए थे. ऐसी अफवाहें थीं कि हाथी के बाहरी दांतों में ज़हर लगा हुआ था जिनको वो लोगों के पेट में घुसा देते थे. उनके ऊपर तीरों और बर्छों का कोई असर नहीं होता था.’

Timur

तैमूर लंग 1369 में समरकंद का राजा बना था. उसका सपना पूरी दुनिया जीतना था.

हाथों से ढेर किया हाथियों का झुंड

दिल्ली के पास जब तैमूर का काफिला पहुंचा तो उसने दिल्ली के पास लोनी में अपना शिविर लगाया और हालात का जाएज़ा लिया. 17 दिसंबर, 1398 को मल्लू ख़ां और सुल्तान महमूद की सेना तैमूर की सेना से लड़ने दिल्ली गेट से बाहर निकली. दोनों सेनाओं के बीच कड़ा मुकाबला हुआ. तैमूर की सबसे बड़ी चिंता यानी भारतीय हाथियों ने मंगोल के सैनिकों के बीच कुछ कोलाहल मचा दिया था. लेकिन तैमूर ने इसकी तैयारी पहले ही कर ली थी. उसने अपने सैनिकों से कहा कि वो ऊंटों की पीठ पर रखी सूखी घास और लकड़ी को आग लगाकर छोड़ दें. अचानक पीठ पर जलती आग के साथ ऊंटों को अपनी तरफ आता देखकर हाथी डर गए. वो अपने ही सैनिकों की तरफ़ मुड़ गए और सैनिकों को कुचलना शुरू कर दिया.

तैमूर भी इसी समय खुद लड़ाई में कूद पड़ा. अपनी आत्मकथा में तैमूर ने लिखा, “मैंने एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी थामी मैं दाएं बाएं तलवार और कुल्हाड़ी चलाता हुआ चल रहा था. मैंने दो बार हाथियों की सूंड काट डाली और जिसकी भी सूंड काटी, वो हाथी घुटने टेक कर एक करवट लेट गया और उसके हौदे पर बैठे सैनिक ज़मीन पर गिर पड़े.” उसने आगे लिखा कि लड़ाई में उसके सारे कपड़े खून से तरबतर हो गए थे. उसकी दोनों कलाइयां घायल हो चुकी थीं और दोनों पैरों पर पांच जगह घाव लगे थे.

कटे सिरों की बनाई मीनार

यह वो समय था जब तैमूर के सैनिक दिल्ली के अंदर दाख़िल हो चुके थे. एक दिन बाद तैमूर एक विजेता की तरह दिल्ली के अंदर घुसा. दिल्ली के सुलतान महमूद और मल्लू ख़ां अपने लोगों को आक्रांता के रहम पर छोड़कर युद्ध के मैदान से भाग खड़े हुए थे. फिर शुरू हुई दिल्ली में अराजकता.

सैनिकों ने अनाज, खजाना और सभी कीमती चीजों को लूटना शुरू कर दिया. मोहम्मद क़ासिम फ़ेरिश्ता अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ द राइज़ ऑफ़ मोहमडन पावर इन इंडिया में’ लिखते हैं कि “हिंदुओं ने जब देखा कि उनकी महिलाओं की बेइज्जती की जा रही है और उनके धन को लूटा जा रहा है तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर अपने ही घरों में आग लगा दी. यही नहीं वो अपनी पत्नियों और बच्चों की हत्या कर तैमूर के सैनिकों पर टूट पड़े. थोड़ी देर में दिल्ली वासियों ने हथियार डाल दिए.”

बचने के लिए दिल्ली वासियों ने पुरानी दिल्ली एक मस्जिद के अहाते में शरण ली. जस्टिन मरोज़ी लिखते हैं, “तैमूर के 500 सैनिकों और दो अमीरों ने मस्जिद पर हमला कर वहां शरण लिए हुए एक-एक व्यक्ति को मार डाला. उन्होंने उनके काटे हुए सिरों की एक मीनार सी बना दी और उनके कटे हुए शरीर चील और कौवों के लिए खाने के लिए छोड़ दिए. लगातार तीन दिनों तक ये कत्ल-ए-आम चलता रहा.”

तैमूर दिल्ली में सिर्फ दो हफ़्ते रहा. इस बीच उसने स्थानीय शहजादों का आत्मसमर्पण और नज़राना स्वीकार किया. समरकंद के आक्रांताओं के पास इतना सामान हो गया था कि वो एक दिन में सिर्फ चार मील तक का ही सफर तय कर पा रहे थे. वहीं, दूसरी ओर दिल्ली खंडहर में बदल गई. सल्तनत के अनाज के भंडार और खड़ी हुई फसलें भी बरबाद हो गईं. वहां किसी तरह से बच गए लोग भुखमरी से मरने लगे. दिल्ली को उस हालत से उबरने में पूरे 100 सालों का समय लग गया.

 

 

 

 

 

 

 

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