बातचीत की नई शुरुआत है यह फ्रेमवर्क
स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित वार्ता से पहले हुए युद्धविराम और बुधवार को हस्ताक्षरित समझौते को अंतिम समाधान नहीं माना जा रहा। इसे 60 दिनों की वार्ता का रास्ता खोलने वाला प्रारंभिक फ्रेमवर्क माना गया है। इस दौरान ईरान के उच्च स्तर के संवर्धित यूरेनियम का क्या होगा, उसके जमे हुए विदेशी फंड का कितना हिस्सा जारी किया जाएगा और यदि कोई तीसरा पक्ष युद्धविराम तोड़ता है तो स्थिति कैसे संभाली जाएगी, जैसे कई अहम सवाल अभी भी अनसुलझे हैं। यह पूरा मसला केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रतिबंध, खाड़ी क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और लेबनान की स्थिति भी जुड़ी हुई है।
‘प्रभावशाली’ देश ज्यादा अहम
आधुनिक संकटों में मध्यस्थता का तरीका पूरी तरह बदल गया है। पहले मध्यस्थ की पहचान उसकी निष्पक्षता से होती थी। लेकिन अब उसकी उपयोगिता इस बात से तय होती है कि वह दोनों पक्षों तक कितनी आसानी से पहुंच सकता है, बैकचैनल बातचीत को कितना सुरक्षित रख सकता है, जरूरत पड़ने पर दबाव बना सकता है और समाधान का भरोसा दिला सकता है। यानी अब कूटनीति केवल बातचीत कराने का नहीं बल्कि परिस्थितियों को नियंत्रित करने का माध्यम बन चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का असर पहले जैसा नहीं रहा
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आज भी मौजूद हैं, लेकिन बड़े वैश्विक संकटों को सुलझाने में उनका प्रभाव लगातार घटा है। कभी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) जैसे संस्थानों और उनके प्रमुखों की भूमिका निर्णायक मानी जाती थी, लेकिन अब युद्ध और शांति की प्रक्रिया कई देशों और कई अलग-अलग माध्यमों में बंट चुकी है। कोई देश वार्ता की मेजबानी करता है, कोई संदेश पहुंचाता है, कोई सुरक्षा की गारंटी देता है और कोई समझौते को लागू कराने में मदद करता है।
पाकिस्तान ने समझौता नहीं कराया, लेकिन…
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच समझौता नहीं कराया, लेकिन जब औपचारिक बातचीत मुश्किल थी तब उसने दोनों देशों के बीच संपर्क बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ईरान से लगी सीमा, खाड़ी देशों पर आर्थिक निर्भरता, चीन के साथ करीबी संबंध और सुरक्षा एजेंसियों के नेटवर्क ने पाकिस्तान को इस भूमिका में उपयोगी बनाया। हालांकि पाकिस्तान स्विट्जरलैंड जैसा तटस्थ देश नहीं है, लेकिन उसकी रणनीतिक स्थिति उसे बातचीत की शुरुआती प्रक्रिया में उपयोगी बनाती है।
ओमान, कतर, सऊदी और तुर्किये का अहम रोल
आधुनिक कूटनीति में अब एक ही देश पूरी मध्यस्थता नहीं करता। पश्चिम एशिया में ओमान, कतर, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। किसी ने वार्ता के लिए जगह उपलब्ध कराई, किसी ने संदेश पहुंचाए, किसी ने मतभेद कम करने की कोशिश की तो किसी ने युद्धविराम को बनाए रखने में सहयोग दिया। वहीं तुर्किये ने अपनी भौगोलिक स्थिति, व्यापारिक संबंधों और सैन्य महत्व के कारण एक प्रभावशाली भूमिका निभाई। ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव इसका बड़ा उदाहरण माना गया, जहां तुर्किये ने संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से एक व्यावहारिक व्यवस्था तैयार कराई।
चीन पर्दे के पीछे रहा
चीन ने प्रत्यक्ष मध्यस्थ बनने की बजाय पर्दे के पीछे रहकर अपनी कूटनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया। तेहरान के साथ उसके मजबूत संबंधों ने पाकिस्तान के माध्यम से चल रही बातचीत को मजबूती दी। दूसरी ओर अमेरिका गाजा, लेबनान और यूक्रेन जैसे संघर्षों में केवल मध्यस्थ नहीं बल्कि सीधे तौर पर एक प्रभावशाली पक्षकार भी है। उसके पास सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक ताकत है, जिसके कारण वह केवल बातचीत ही नहीं बल्कि समझौते की शर्तें तय करने, सुरक्षा आश्वासन देने और दबाव बनाने में भी सक्षम है।
पुराने यूरोपीय मॉडल की भूमिका हुई सीमित
एक समय नॉर्वे जैसे तटस्थ देशों को मध्यस्थता का आदर्श मॉडल माना जाता था, अब उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है। आज भी ऐसे देश मानवीय सहायता, बैकचैनल संवाद और समझौतों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन तेजी से बदलते युद्धों और भू-राजनीतिक संकटों में केवल निष्पक्षता पर्याप्त नहीं रह गई है। अब संघर्षरत पक्ष ऐसे देशों को ज्यादा महत्व देते हैं जिनके पास वास्तविक प्रभाव और दबाव बनाने की क्षमता हो।
भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा संदेश?
भारत के पश्चिम एशिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध हैं। भारत रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए मानवीय सहायता, संकट के समय अपने नागरिकों की सुरक्षित निकासी और क्षेत्रीय स्थिरता में लगातार सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। यही कारण है कि भारत हर संघर्ष का औपचारिक मध्यस्थ भले न बने, लेकिन संवाद कायम रखने, तनाव कम करने और भरोसेमंद साझेदार की भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। बदलती वैश्विक कूटनीति में यही भारत की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है।
बदल गई है दुनिया की कूटनीति
अब सवाल यह नहीं है कि कौन सबसे अधिक तटस्थ है, बल्कि यह है कि किसके पास दोनों पक्षों तक पहुंच है, कौन बैकचैनल सुरक्षित रख सकता है, कौन जरूरत पड़ने पर दबाव भी बना सकता है और कौन बिना किसी पक्ष को अपमानित किए समझौते तक पहुंचने का रास्ता तैयार कर सकता है। आधुनिक दौर में वही देश सबसे प्रभावी मध्यस्थ बन रहे हैं जिनके पास प्रभाव, संसाधन, रणनीतिक पहुंच और भरोसा चारों चीजें एक साथ मौजूद हैं।