किसान ने खोजा विरोध का अनोखा तरीका, नहीं मिला जमीन पर हक तो मिट्टी में खुद को दबा दिया

किसी को उसके हक से वंचित किया जाए तो विरोध करना उसका हक होता है. लेकिन विरोध कितना प्रभावी है, यह कई बातों पर निर्भर करता है. कई बार विरोध करने वाले कमजोर होते हैं तो उनके पीछे संख्याबल होता है. कई बार संख्याबल नहीं होता है, लेकिन विरोध करने वाला अपने आप में ही ताकतवर होता है. कई बार दोनों ही संयोग नहीं बैठता. ऐसे में विरोध तभी प्रभावी हो सकता है, जब विरोध का तरीका अनोखा हो. महाराष्ट्र के जालना जिले के एक किसान ने विरोध करने के लिए खुद को जमीन के नीचे दबा दिया.

जालना जिले के मंठा तहसील के खेलस गांव के रहने वाले किसान सुनील जाधव की शिकायत है कि उन्हें साल 2019 में करमवीर दादासाहब गायकवाड़ सबलीकरण स्वाभिमान योजना के तहत दो एकड़ जमीन दी गई थी. लेकिन आज तक उन्हें जिस जमीन को देने की घोषणा की गई, उसका पजेशन नहीं मिला. इसलिए विरोध का अनोखा तरीका अपनाते हुए सुनील जाधव ने खुद को मिट्टी के नीचे दबा दिया है. उनका पूरा शरीर मिट्टी के अंदर है सिर्फ सिर ही जमीन से ऊपर है.

जमीन के नीचे दबे रहेंगे तब तक, हक नहीं मिल जाता जब तक

सुनील जाधव का कहना है कि वे 2019 से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काट कर थके चुके हैं. अब तो वे जमीन के नीचे से बाहर तभी आएंगे जब उन्हें उनके हक की जमीन का कब्जा मिलेगा. वरना वे इसी तरह चार फुट जमीन के नीचे दबे रहेंगे, धंसे रहेंगे. उनका कहना है कि जब कोई रास्ता नजर नहीं आया और कोई विकल्प दिखाई नहीं दिया, तब जाकर उन्होंने इस तरह से विरोध करने का फैसला किया.

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जमीन दिया है तो कागजात क्यों नहीं देते हो, नहीं दे सकते तो ऐलान क्यों करते हो?

किसान सुनील जाधव की बस एक ही मांग है कि उनके नाम जो तीन साल पहले जिस कल्याणकारी योजना की बड़ी-बड़ी घोषणा करते हुए जो दो एकड़ जमीन अलॉट की गई थी, उसके कागजात उन्हें सौंप दिए जाएं, क्योंकि जब तक कागजात पास में नहीं हैं, तब तक उनके पास इसका कोई प्रमाण नहीं रह जाता कि उनके नाम सरकार ने जमीन आवंटित की हुई है.

 

 

 

 

 

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