सियाचिन में दुश्मन की गोली से ज्यादा बेरहम मौसम, होती है कड़ी ट्रेनिंग, तस्वीरें देख कर कांप जाएंगे

भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स की महिला अधिकारी कैप्टन शिवा चौहान सियाचिन ग्लेशियर पर जहां तैनात हुई हैं, वहां की तस्वीरें ही आम लोगों की रूह कंपाने वाली हैं. दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र पर दुश्मन की गोली से ज्यादा बेहरम मौसम होता है. यहां दिन में -50 डिग्री और रात में -70 डिग्री तक तापमान रहता है. इसीलिए यहां तैनात होने वाले जवानों को कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है. यह प्रशिक्षण इतना सख्त होता है कि आधे से अधिक जवान इसे पूरा ही नहीं कर पाते. आइए जानते हैं कि यहां तैनात होने से पहले जवानों की किस तरह की ट्रेनिंग होती है और यहां पर उन्हें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

कैप्टन शिवा चौहान की ये फोटो भारतीय सेना के @firefurycorps_IA अकाउंट से शेयर की गई है.

10 हजार फीट की ऊंचाई पर होती है पहली ट्रेनिंग

आर्मी के जवानों को सियाचिन ग्लेशियर में तैनात करने से पहले कठिन प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है. इसके लिए उन्हें गुलमर्ग के पास स्थित खिल्लनमर्ग में 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हाई एटीट्यूड वारवेयर स्कूल भेजा जाता है. इस स्कूल की गिनती दुनिया के बेहतरीन स्कूलों में होती है. यहां जवानों को सबसे पहले बर्फ में भारी वजन के साथ स्कीइंग करना सिखाया जाता है. उन्हें इस बात के लिए तैयार किया जाता है कि वह बर्फ में खुद कैसे सर्वाइव कर कैसे दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं. शुरुआती ट्रेनिंग के बाद उन्हें माउंटेन वॉरफेयर का प्रशिक्षण दिया जाता है. यहां के बाद जवानों को सिचाचिन बैटल स्कूल भेजा जाता है जहां उन्हें एक महीने की ट्रेनिंग लेनी होती है.

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बर्फ में रहते हैं, बर्फ में ही बनाते हैं खाना

हाई एटीट्यूड वॉरफेयर स्कूल में ट्रेनिंग के लिए एक बार में 250 से 300 जवानों को चुना जाता है. यहां सैनिकों को ये बताया जाता है कि वे बर्फ में ऐसा क्या करें कि खुद को सुरक्षित रख पाएं और देश की रक्षा भी कर पाएं. सबसे पहले इन्हें अलग-अलग टुकड़ियों में बांटा जाता है, स्कीइंग में ट्रेंड करने के बाद इन्हें सर्वाइव करने का प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके लिए इन्हें माइनस तापमान में 25 से 30 फीट जमी बर्फ पर बने इग्लू में रहना पड़ता है. इनका खाना-पीना सब बर्फ में ही होता है. ताकि ये ग्लेशियर पर रहने में सक्षम हो सकें.जवानों को यहां बर्फीले तूफानों से बचने तथा अस्थाई शेल्टर बनाने के बारे में भी ट्रेंड किया जाता है. यह प्रशिक्षण तकरीबन 9 सप्ताह का होता है, इसके बाद दो सप्ताह तक जवानों को एडवांस ट्रेनिंग भी दी जाती है. यह ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें सियाचिन बैटल स्कूल यानी की सियाचिन बेस कैंप भेजा जाता है, जहां उनकी ट्रेनिंग का अगला चरण शुरू होता है.

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सियाचिन पर जवानों को इस तरह की कठिन परिस्थतियों से गुजरना पड़ता है.

बर्फ पर चढ़ने, दर्रे पार करने की ट्रेनिंग

सियाचिन बेस कैंप में जवानों को हथियार चलाने ओर सर्दी में मददगार साबित होने वाले उपकरणों की ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें बर्फीले पहाड़ पर चढ़ने और दर्रे पार करना सिखाया जाता है, यहां तकरीबन 5 सप्ताह की ट्रेनिंग होती है. इसमें बर्फ साफ करने और राहत-बचाव कार्य के बारे में भी सिखाया जाता है. यदि एक महीने की ट्रेनिंग के बाद भी कोई तैयार नहीं होता है तो उन्हें फिर एक महीने ट्रेनिंग का मौका दिया जाता है. ताकि वह सियाचिन की परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल सके.

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…तो कट सकता है हाथ

ट्रेनिंग के बाद जवानों को हेलीकॉप्टर के जरिए चौकी तक पहुंचाया जाता है. यहां जवानों को हथियार चलाने के लिए एंटी फ्रॉस्टबाइट दस्ताने दिए जाते हैं. यदि इन दस्तानों का प्रयोग नहीं किया गया तो जवानों के हाथ भी कट सकते हैं. सर्दी का आलम ऐसा होता है कि दस्तानों में जो पसीना निकलता है वह भी कुछ सेकेंड में ही बर्फ बन जाता है. यहां जवानों के लिए खाना एक बड़ी चुनौती है. कई बार चीता हेलीकॉप्टरों की मदद से डिब्बा बंद खाना वहां पहुंचाया जाता है. इसके अलावा हथियार, गोलाबारूद पहुंचाने का काम भी चीता हेलीकॉप्टर ही करते हैं.

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सियाचिन पर हथियार, गोला बारूद और रसद पहुंंचाने का काम चीता हेलीकॉप्टर करते हैं.

तीन महीने के लिए होती है तैनाती

सियाचिन ग्लेशियर पर जवानों की तरह तीन महीने के लिए होती है. इस दौरान उन्हें नहाने नहीं दिया जाता. यदि नहाना भी हो तो महीने में एक बार ऐसा कर सकते हैं. हर रात जवानों को चौकी के सामने से बर्फ हटानी पड़ती है. ऐसा न करने पर जमीन फटने का खतरा रहता है. जवानों को पानी के लिए बर्फ पिघलानी पड़ती है. इसके लिए एक गोली दी जाती है, ताकि वह पानी शुद्ध हो सके.

चश्मे न पहने तो जा सकती है आंखों की रोशनी

यहां तैनात जवानों को एक खास तरह के चश्मे दिए जाते हैं जो खास पराबैगनी प्रतिरोधी होते हैं, यदि ये चश्मे न पहने जाएं तो बर्फ पर पड़ रही सूरज की चमक से आंखों की रोशनी जाने का खतरा बढ़ जाता है. इन्हें एल्युमीनियम अलॉय और पॉलीथिन से बने पिट्ठू बैग दिए जाते हैं, जिसमें 25 किलोग्राम तक सामान लादा जा सकता है. इन सैनिकों के जूते 4 किलोग्राम तक बजनी होते हैं, इनमें नीचे कील लगी होती है.

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